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Thursday, 28 June 2018

Beautiful pictures after rain


गाँव के कुछ मनमोहक दृश्य ( Beautiful pictures of the village after rain)











Friday, 15 June 2018

21वीं सदी में भी अंधविश्वास और अज्ञानता कम नहीं

21वीं सदी में भी अंधविश्वास और अज्ञानता कम नहीं-:

(संक्षेप)-यह कहानी दक्षिणी दिल्ली के ऐसे युवा जोड़ी की है जो बचपन से यौवन तक साथ में

ही बिताता है और अब प्रेम में इस प्रकार विलीन हो चुका होता है जैसे समुद्र का अथाह जल। (जो कभी नहीं सूखता, अर्थात इनकी प्रेयसी मानसिकताएं समुद्र के जल की तरह अजर और अमर रहेंगे, इस प्रकार की कल्पना करते हैं).

परंतु इस सामाजिक एवं प्राचीन मान मर्यादाएं इन्हें इस प्रकार पृथक करती हैं मानों समुद्र का

पूरा जल समाप्त हो गया हो और वहां की धरती में जल के अभाव में दरारें पड़ गई हों। (वहीं दिखाने की कोशिश की गई है)
तो किस प्रकार समाज के अतीत मान मर्यादाओं का निर्वहन इनके पृथकता की कारण बनती है,

कवि ने
वही अपनी कलम की सहायता से यहां पर उतारने की कोशिश करी है।

ध्यान दीजिए-:

जैसा कि आप जान चुके हैं कि यह कहानी (दक्षिणी दिल्ली के) ऐसे कस्बे की है जहां पर
एक प्राइवेट कंपनी ने अपने कर्मचारियों के लिए रेजिडेंस फ्लैट मुहैया कराया हुआ होता है
जिसमें ज्यादातर कर्मचारी अपने परिवार को साथ लेकर ही रहते हैं, अपने बच्चों की पढ़ाई

इत्यादि यहीं से करवाते हैं।

फ्लैट नंबर L-212 में एक लड़का अपने पेरेंट्स के साथ रहने आया, उसका नाम था मणिक त्रिपाठी।

(आपको ध्यान रहे कि इस कहानी का जो नायक है वह मणिक त्रिपाठी ही है)

घर का सामान शिफ्ट हुआ, बाद में ग्रहभोज हुआ आदि। फैमिली रहने लगी कुछ दिन बीते
अब मणिक के छठी क्लास का एडमिशन डेट समीप आ रहा था तैयारी में लगा हुआ था,
एडमिशन हुआ क्लासेस शुरु हो गईं इस प्रकार से चलने लगा। बताते चलें कि मणिक एक
पॉजिटिव थिंकिंग लड़का था। फ्रेंडली रहता था । कुछ ही दिनों में उसके कई सारे मित्र भी

बन चुके थे।

(यहां पर एंट्री होती है नायिका की)

एक दिन जब स्कूल से लौट रहा था तो उसकी नज़र पड़ी कि सामने वाली फ्लैट नंबर G-
221 की एक लड़की भी इसी स्कूल में पढ़ती थी, वे दोनों एक दूसरे को पहचानते थे इसलिए
मिले और अब तो एक-दूसरे को जान भी लिया| कुमुद नाम था उसका मणिक ने ही मुझे

बताया।

जान पहचान करने के बाद बराबर मिलने लगे, कुछ दिनों में एक दूसरे के काफी करीब आ

गए।

समय बीतता रहा नजदीकियां बढ़ती गई।

धीरे-धीरे वह समय आ चुका था जब दो हृदयों की एक धड़कन होने लगी थी। (बताते चलें
कि जब बच्चे युवा हो जाते हैं (स्पेशली आजकल) तो कुछ बात अपने मन की ही करते हैं,
जैसे:- स्कूल न जाना, बंक मारना, क्लास छोड़ना, घर से गायब रहना आदि) आप तो समझ
ही चुके होंगे कि ऐसी मनोदशा कब-कब होती है। समय आ चुका था कि इंटरमीडिएट

फाइनल में था मणिक, और ग्रेजुएशन के फर्स्ट ईयर में कुमुद।

मणिक एवं कुमुद एक दूसरे से काफी प्रेम करने लगे थे। इतना कि हर एक क्षण एक दूसरे

में ही विलीन रहते थे।

(कवि का मानना है कि कुमुद और मणिक में इतना अथाह प्रेम हो चुका था कि जैसे समुद्र
का जल जो कितना भी कोशिश किया जाए फिर भी उसे समाप्त नहीं किया जा सकता।)

समय अपनी चरम सीमा वाली रफ्तार से चल रहा था, और यह प्रेमी युगल अपनी रफ्तार से
कुछ समय और बीता पढ़ाई पूरी हो चुकी थी।
(इनके परिवार वालों की निगाहों में, जहां तक मेरा मानना है) 
इधर इनको दुनिया में कुछ भी नहीं दिखाई पड़ रहा था बजाय एक दूसरे के।
कुछ समय पश्चात दोनों ही घरों में शादी विवाह की बातें शुरू हो गई थी।

(कवि को बड़ी घृणा है इस अज्ञानता में डूबे हुए ऐसे लोगों की परंपरा से जो बिना, लड़का हो या लड़की
उसके पैरों पर खड़े होने से पहले ही उसकी शादी विवाह करा देते हैं और फिर वह जीवन
भर आर्थिक परिस्थितियों का सामना करते हुए रोते-बिलखते दिखाई पड़ते हैं)

कुमुद मणिक के सिवाय किसी को तो सोच भी नहीं सकती थी।

मणिक की मनोदशा भी यही दर्शाती थी।

यहां प्रश्न यह उठता है कि जब एक दूसरे के सिवाय किसी तक को सोच तक नहीं सकते थे,
फिर ऐसी कौन सी आधीं इनके पृथकता का कारण बन गई।
एक दृष्टि डालते हैं कुमुद के घर पर,

संवाद है

ध्यान दीजिए:-

दादी-:

बेटा कुमुद, कल जल्दी तैयार हो जाना लड़के वाले आ रहे हैं।

कुमुद-:

(सहमी हुई) लड़के वाले? अनजान बनते हुए।

दादी-:

हां हां लड़के वाले तुझे देखने आ रहे हैं, अब शादी हो जाएगी तेरी तू अपने घर चली जाएगी।

कुमुद-:

शादी की जल्दी ही क्या है मैंने तो नौकरी के लिए अप्लाई किया है, उसके तैयारी में लग

जाऊं। (चिंता व्यक्त करते करते हुए)

दादी-:

(झेंपते हुए) हां हां अब औरत कमाने जाएगी, औरत घर का खर्चा चलाएगी।

कुमुद-:

टाल-मटोल करते हुए घर में चली जाती है।।।

इधर मणिक के घर का हाल देखिए,

विवाह की बात छिड़ते ही मणिक ने साफ-साफ कह दिया कि, यदि वह अपनी वैवाहिक
जीवन संपन्न करेगा तो उसकी जीवन संगिनी कुमुद ही होगी। किसी और के बारे में सोचने

को भी नहीं सोच सकता।

एक बार फिर प्रश्न उठता है कि मणिक भी रिश्ते के लिए तैयार था तो परेशानी किस बात

की थी ?

आगे देखिए क्या होता है।

मणिक को इस प्रकार का हठ करता हुआ देख उसके दादा श्री लौटन प्रसाद त्रिपाठी जी ने

कुमुद से विवाह वाली बात पर चिंता व्यक्त की।

इधर मणिक ने कुमुद को यह संदेशा कहलवा दिया कि, उसने भरे समाज में उसे अपनी

जीवन संगिनी चुना है। अपनी राय शीघ्र दे।

संदेशा आते ही कुमुद का मन पुलकित हो उठा, और साथ ही मन में तरह-तरह के सवाल
उठने लगे। कुमुद अपने घर में बात करने की कोशिश की, सबसे प्रिय उसकी दादी थी

इसलिए उसके पास जाकर जीवन का समय किस प्रकार चल रहा था किस प्रकार मणिक से

अथाह प्रेम करती थी सारी व्याख्या कर डाली।

दादी ने प्रेम की गहराई को नापते हुए इस बात की हामी भरी की परिवार में इस विषय पर

बात करेगी।

इस दौरान मणिक किसी नौकरीपेशा की तलाश में भटकता है। (क्योंकि विवाह का प्रेशर है)
इधर कुमुद के घर में सब एक साथ बैठकर मणिक के साथ विवाह वाली मुद्दे पर विचार

करते हैं।

ध्यान दीजिए:-

ए जो कुमुद और मणिक का विवाह होना एक मुद्दा बना हुआ है इसका खास कारण श्री
लौटन प्रसाद जी का कड़वा स्वभाव एवं कुमुद के परिवार के कुल की भिन्नता है।

(कवि का कहना है कि जब जाति-उपजाति के अनुसार कर्म सुनिश्चित होते थे तब तो ठीक था, परंतु जब हर एक व्यक्ति प्रत्येक कर्म का भागी बन रहा है तो फिर जाति-उपजाति मेंइतना बड़ा भेद क्यों ?)

कुमुद के घर में यह तय हुआ कि दोनों घरों के परिवारों को एक साथ बैठकर बात करके,

विवाह संपन्न करवाने के बारे में सोचना चाहिए।

ध्यान दीजिए-:

दोनों ही परिवार किसी विशेष जगह पर पहुंचते हैं, अभी मिले नहीं हैं दूर से ही त्रिपाठी जी

मणिक से:- अरे ये यहां किसलिए आए हैं ?
मणिक के चेहरे पर सन्नाटा छा जाता है।
उधर कुमुद के पिताजी उसकी मां से:-
त्रिपाठी जी यहां क्यों आए हैं ?

एक दूसरे से बात करते हुए पास पहुंचते हैं। (एक बात का ध्यान रहे कि) त्रिपाठी परिवार को
कुमुद के परिवार को भलीभांति नहीं जानता था, उसके परिवार का जाति क्या है, कुल क्या है

इनके व्यवसाय आदि।
ध्यान दीजिए:-

वार्तालाप प्रारंभ हुई होते-होते एक-दूसरे के मेल-व्यवहार, आमदनी, व्यवसाय आदि की बातें

करते हुए कुमुद के पिता के मुंह से जैसे ही निकला कि क्षत्रिय हैं और वह किस प्रकार

इंजीनियर पद पर कार्यरत हैं।

क्षत्रिय?

त्रिपाठी जी किसी भिन्न कुल का नाम सुनकर जिस प्रकार उठ खड़े हुए, लगा मानो इससे आगे कुछ
सुनना ही नहीं चाहते थे। वे केवल ब्राम्हण कुल में ही विवाह किया जाना स्वीकार कर सकते
थे, किसी अन्य कुल का नाम सुनकर वह भड़क उठे।

( प्राचीन मान-मर्यादाओं पर अटूट विश्वास था उनका। उन्हें क्या पता युवा पीढ़ी क्या है प्रेम क्या है।)

कुमुद के पिता को त्रिपाठी जी की इस प्रकार से क्रोध करने पर एक धक्का सा लगा और वो भी क्रोधित हो
गए। दोनों में तू-तू मैं-मैं होने लगी। रिश्तेदारों ने दोनों पक्षों को समझाने का प्रयास किया

परंतु वे असफल रहे।

उन दोनों की बहस ने प्रचंड रूप ले लिया था। आइए देखते हैं।

संवाद:-
त्रिपाठी जी:-

मुझे तो मणिक की बातों से ही लग रहा था कि अवश्य कोई गहरी चाल चली है तुमने।

कुमुद के पिता:-

दांव पेच तो तुम लोग करते हो मुझे तो तुम जैसे विचारधारा रखने वाले लोगों से ही घृणा

है।

त्रिपाठी जी:-

तुम्हें घृणा ही थी तो फिर किस लिए बुलाया था ?

शक्ल मत दिखाना कभी।
कुमुद के पिता:-

हम इतने भी बुरे नहीं हैं यह दुनिया बहुत बड़ी है।

....... आदि।

इस प्रकार रिश्ते को खंडित कर देने देने वाले बहस और टकराव ने इस प्रेयसी मन को इस
प्रकार सुखा कर रख दिया मानों (महाकुंभ) जल के सागर से जल पूर्ण रूप से सूख गया हो,
उसमें उठने वाली लहरें विलीन सी हो गई हों, तत्पश्चात धरती में दरारें पड़ने लगी हों। कुछ
ऐसी मनोदशाएं हो गईं इन प्रेमियों की। बिलखते हुए टूटे मन से वापस आते हैं ।

जैसा कि आपने देख लिया इन सामाजिक अंधविश्वास और अज्ञानता ने किस प्रकार इस
महान प्रेम (त्याग) का कोई मूल्य नहीं समझा निरादर किया और अपने ही बच्चों को टूटने

और बिखरने पर मजबूर कर दिया।

आज के युवा की क्या आवश्यकता है इस बात की पुष्टी सभी प्राचीन मान्य मर्यादाएं नहीं

कर सकती,

कुछ चीजें ऐसी हैं जिनका तरीका बदल चुका है।)

((आखिरकार हार मान कर उन प्रेमियों ने क्या किया जिसको अगले अध्याय में बताऊंगा।))

Thanks very much for your interest.

Your's
Shravan Siddharthi

IN FACT WHAT WE SHOULD DO ?

O people, as far as I believe, We must keep trying to learn something new in our life every moment. Because you know the birth of a human...